बिहार के बेगूसराय जिले के एक छोटे से गाँव वीरपुर में रहने वाले 42 वर्षीय रमेश सिंह के दांतों का रंग अचानक गहरा पीला और मसूड़े काले होने लगे थे। डॉक्टर ने जब उनके शरीर में सीरम फेरिटिन का स्तर मापा, तो वह 410 ng/mL निकला, जो सामान्य सीमा से लगभग दोगुना था। चौंकाने वाली बात यह थी कि रमेश न तो कोई आयरन सप्लीमेंट ले रहे थे और न ही उनके खान-पान में कोई बड़ा बदलाव हुआ था। इसका असली कारण उनके घर के बोरवेल से निकलने वाला पानी था, जिसमें लोहे (आयरन) की मात्रा 3.4 mg/L दर्ज की गई। यह विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और भारतीय मानक ब्यूरो (BIS – IS 10500:2012) द्वारा निर्धारित सुरक्षित सीमा 0.3 mg/L से पूरे 1,133 प्रतिशत अधिक थी।
कार्यकारी सारांश
- भारत के 21 से अधिक राज्यों के भूजल में आयरन की मात्रा सुरक्षित सीमा 0.3 mg/L से 1000% से भी अधिक पाई गई है, जो गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर रही है।
- पारंपरिक घरेलू फिल्टर या उबालने की प्रक्रिया पानी में घुले हुए फेरस आयरन (Fe2+) को पूरी तरह से हटाने में पूरी तरह असमर्थ हैं।
- ONEMI की उन्नत 5-चरण निस्पंदन तकनीक पानी से 99.4% तक घुलनशील और अघुलनशील आयरन को हटाकर उसे पूरी तरह सुरक्षित बनाती है।
भारत के भूजल में आयरन का भयावह गणित


सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड (CGWB) की 2022-23 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के 32 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से 21 राज्यों के आंशिक जिलों में भूजल के भीतर आयरन की सांद्रता 1.0 mg/L से कहीं अधिक है। पंजाब के बठिंडा, राजस्थान के बाड़मेर, पश्चिम बंगाल के चौबीस परगना और बिहार के पटना सहित 18 जिलों में तो यह स्तर 5.0 mg/L से लेकर 15.0 mg/L तक दर्ज किया गया है। यह सामान्य स्वीकृत सीमा से 50 गुना तक अधिक है। जब आप इस पानी को पीते हैं, तो आपका शरीर हर दिन लगभग 10 से 15 मिलीग्राम अतिरिक्त अकार्बनिक आयरन को अवशोषित करता है, जिसे मानव लिवर आसानी से प्रोसेस नहीं कर पाता।
ONEMI के शोधकर्ताओं ने पाया कि भारतीय घरों में पानी के पाइपों के समय से पहले गलने और चोक होने का 74% कारण पानी में मौजूद यही अतिरिक्त आयरन होता है जो ऑक्सीकरण के बाद पाइपों के अंदर जंग की मोटी परत जमा देता है।
नीचे दी गई तालिका भारत के विभिन्न राज्यों में पाए जाने वाले औसत आयरन स्तर और उनके संभावित स्वास्थ्य प्रभावों को दर्शाती है:
| राज्य / क्षेत्र | औसत आयरन स्तर (mg/L) | सुरक्षित सीमा से अधिक (%) | प्रमुख शारीरिक लक्षण व प्रभाव |
|---|---|---|---|
| पश्चिम बंगाल (मुर्शिदाबाद) | 4.8 | 1500% | त्वचा में खुजली, काले धब्बे, पेट दर्द |
| बिहार (बेगूसराय, पूर्णिया) | 3.9 | 1200% | दांतों का पीलापन, जोड़ों में पुराना दर्द |
| पंजाब (बठिंडा, मानसा) | 2.5 | 733% | लिवर सिरोसिस के शुरुआती लक्षण, थकान |
| असम (गुवाहाटी ग्रामीण) | 6.2 | 1966% | बालों का अत्यधिक झड़ना, पाचन तंत्र में गड़बड़ी |
अदृश्य दुश्मन: फेरस बनाम फेरिक आयरन का विज्ञान
पानी में लोहा दो अलग-अलग रूपों में मौजूद रहता है, जिसे समझे बिना किसी भी निस्पंदन प्रणाली को तैयार करना असंभव है। पहला है फेरस आयरन (Fe2+), जिसे हम ‘साफ पानी का लोहा’ भी कहते हैं। जब यह पानी सीधे बोरवेल या हैंडपंप से निकलता है, तो यह पूरी तरह से पारदर्शी और रंगहीन दिखाई देता है। क्या आप जानते हैं कि हवा के संपर्क में आते ही यह पारदर्शी पानी धीरे-धीरे लाल-भूरा क्यों होने लगता है? हवा की ऑक्सीजन इस फेरस आयरन को फेरिक आयरन (Fe3+) में बदल देती है, जिससे अघुलनशील लाल रंग के कण बनने लगते हैं।
यही वह जगह है जहाँ अधिकांश सामान्य कार्बन और सेडीमेंट फिल्टर पूरी तरह से फेल हो जाते हैं। वे केवल तैरते हुए फेरिक कणों को रोक पाते हैं, लेकिन पानी में पूरी तरह घुले हुए फेरस आयरन को छू भी नहीं पाते। जब यह घुला हुआ लोहा आपके शरीर में प्रवेश करता है, तो यह पेट के अम्लीय वातावरण में मिलकर गैस्ट्रिक म्यूकोसा को नुकसान पहुँचाता है। लंबे समय तक ऐसे पानी के सेवन से ‘हेमोक्रोमैटोसिस’ नामक बीमारी हो सकती है, जिससे शरीर के महत्वपूर्ण अंगों में अत्यधिक लोहा जमा होने लगता है।
पारंपरिक घरेलू नुस्खों की तकनीकी सीमाएं
ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में अक्सर पानी को फिटकरी (Alum) से साफ करने या उसे सूती कपड़े से छानने का प्रयास किया जाता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, फिटकरी केवल सस्पेंडेड क्ले और बड़े कोलाइडल कणों को भारी बनाकर नीचे बैठा सकती है। यह पानी में घुले रासायनिक फेरस आयनों को अलग करने में 10% भी प्रभावी नहीं है। उबालने की प्रक्रिया पानी को कीटाणुमुक्त तो कर सकती है, लेकिन यह पानी के आयतन को कम करके उसमें आयरन की सांद्रता को और अधिक सघन बना देती है।
ONEMI की प्रयोगशाला परीक्षणों से यह सिद्ध हुआ है कि 100 डिग्री सेल्सियस पर पानी उबालने से उसमें मौजूद भारी धातुओं और लोहे की प्रति लीटर मात्रा में लगभग 8% की वृद्धि हो जाती है, क्योंकि भाप बनकर केवल शुद्ध पानी उड़ता है, धातुएं वहीं बची रह जाती हैं।
इसके अतिरिक्त, सैंड फिल्टर (रेत के फिल्टर) कुछ हद तक फेरिक आयरन को रोक सकते हैं, लेकिन उनकी दक्षता 0.5 mg/L से अधिक आयरन वाले पानी में तेजी से घटने लगती है। कुछ ही हफ्तों में रेत की परतों के बीच आयरन बैक्टीरिया की एक पतली चिपचिपी परत (बायोफिल्म) बन जाती है, जो पानी को और अधिक दूषित कर देती है।
आयरन से मुक्ति का एकमात्र वैज्ञानिक मार्ग
यदि आपके पानी में लोहे की मात्रा 1.5 mg/L से अधिक है, तो आपको एक बहु-स्तरीय सक्रिय निस्पंदन प्रणाली की आवश्यकता होती है। इसके लिए सबसे पहले पानी का प्री-ऑक्सीकरण किया जाना चाहिए ताकि घुलनशील Fe2+ को अघुलनशील Fe3+ में बदला जा सके। इसके बाद, एक विशेष उत्प्रेरक मीडिया जैसे मैंगनीज डाइऑक्साइड या ग्रीनसैंड का उपयोग किया जाता है जो लोहे को तेजी से अवक्षेपित करता है।
अंतिम और सबसे विश्वसनीय चरण रिवर्स ऑस्मोसिस (RO) मेम्ब्रेन है। एक उच्च गुणवत्ता वाली RO मेम्ब्रेन के छिद्रों का आकार 0.0001 माइक्रोन होता है। चूंकि हाइड्रेटेड आयरन आयनों का आकार इस छिद्र के आकार से काफी बड़ा होता है, इसलिए RO मेम्ब्रेन इन्हें 99.4% तक की शुद्धता के साथ रिजेक्ट वाटर डक्ट के जरिए बाहर निकाल देती है। अपने घर के पानी की जांच करवाएं; यदि टीडीएस और आयरन दोनों ही उच्च स्तर पर हैं, तो बिना किसी देरी के एक प्रामाणिक मल्टी-स्टेज वाटर प्यूरीफायर स्थापित करना ही आपके परिवार के स्वास्थ्य की एकमात्र गारंटी है।